इक्कीसवीं सदी में मध्यकाल का पुनर्पाठ

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इक्कीसवीं सदी में मध्यकाल का पुनर्पाठ यह पुस्तक इतिहास और साहित्य की पुनर्व्याख्या का एक सार्थक प्रयोग है। कुल तीस शोध-पत्र इस पुस्तक में शामिल हैं। इसमें मध्यकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा कबीर दास, तुलसी दास, सूरदास, मीराबाई जैसे कवियों के पुर्नपाठ की संभावना पर विस्तृत चर्चा की गई है।

मुख्य रूप से हिंदी साहित्य के भक्तिकाल और रीतिकाल पर केंद्रित इस पुस्तक में इतिहास और साहित्य के सैद्धांतिक पक्षों का भी गहन अध्ययन किया गया है। हमारे देश के बौद्धिक वर्ग मध्यकालीन इतिहास के पुनर्लेखन को लेकर जिन सवालों से जूझ रहे हैं, यह पुस्तक उन सवालों का एक सार्थक जवाब है। इसमें नए अध्ययन क्षेत्रों की भी तलाश है।

हिंदी साहित्य के मध्यकाल को आदि से अंत तक वर्तमान संदर्भ में देखना इस पस्तक का मुख्य उद्देश्य बन गया है। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा जैसे रचनाकारों को वर्तमान समय की बाजारवादी सोच के साथ जोड़कर उन्हें अध्ययन की दृष्टि से प्रासंगिक बनाना इसकी सबसे बड़ी सफलता है। सूचना के इस युग में इंटरनेट हम इंसानों की हर जरूरत को चुटकी में पूरी कर देती है। ऐसी स्थिति में कोई भी परंपरावादी सोच आज की पीढ़ी के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकती। प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी साहित्य के मध्यकाल को ठीक वर्तमान समय के संदर्भ में ही देखा गया।

इस दृष्टि से यह पुस्तक नई पीढ़ी की सोच के बिल्कुल अनुकूल है। पूरे पुस्तक को पढ़ने के बाद यह मालूम होता है कि इस पुस्तक के माध्यम से कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनके बारे में इससे पहले शायद किसी ने सोचा होगा! यह पुस्तक आगामी दिनों में गहन अध्येताओं के लिए पथप्रदर्शक का काम करेगी।

SKU: ISBN 978-81-939315-0-9 Categories: , Tag: Product ID: 272

Description

इक्कीसवीं सदी में मध्यकाल का पुनर्पाठ यह पुस्तक इतिहास और साहित्य की पुनर्व्याख्या का एक सार्थक प्रयोग है। कुल तीस शोध-पत्र इस पुस्तक में शामिल हैं। इसमें मध्यकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल तथा कबीर दास, तुलसी दास, सूरदास, मीराबाई जैसे कवियों के पुर्नपाठ की संभावना पर विस्तृत चर्चा की गई है।

मुख्य रूप से हिंदी साहित्य के भक्तिकाल और रीतिकाल पर केंद्रित इस पुस्तक में इतिहास और साहित्य के सैद्धांतिक पक्षों का भी गहन अध्ययन किया गया है। हमारे देश के बौद्धिक वर्ग मध्यकालीन इतिहास के पुनर्लेखन को लेकर जिन सवालों से जूझ रहे हैं, यह पुस्तक उन सवालों का एक सार्थक जवाब है। इसमें नए अध्ययन क्षेत्रों की भी तलाश है।

हिंदी साहित्य के मध्यकाल को आदि से अंत तक वर्तमान संदर्भ में देखना इस पस्तक का मुख्य उद्देश्य बन गया है। कबीर, सूर, तुलसी, मीरा जैसे रचनाकारों को वर्तमान समय की बाजारवादी सोच के साथ जोड़कर उन्हें अध्ययन की दृष्टि से प्रासंगिक बनाना इसकी सबसे बड़ी सफलता है। सूचना के इस युग में इंटरनेट हम इंसानों की हर जरूरत को चुटकी में पूरी कर देती है। ऐसी स्थिति में कोई भी परंपरावादी सोच आज की पीढ़ी के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकती। प्रस्तुत पुस्तक में हिंदी साहित्य के मध्यकाल को ठीक वर्तमान समय के संदर्भ में ही देखा गया।

इस दृष्टि से यह पुस्तक नई पीढ़ी की सोच के बिल्कुल अनुकूल है। पूरे पुस्तक को पढ़ने के बाद यह मालूम होता है कि इस पुस्तक के माध्यम से कुछ ऐसे तथ्य सामने आए हैं जिनके बारे में इससे पहले शायद किसी ने सोचा होगा! यह पुस्तक आगामी दिनों में गहन अध्येताओं के लिए पथप्रदर्शक का काम करेगी।

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