अनुवाद और तुलनात्मक अध्ययनः एक भारतीय दृष्टि

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अखिल विश्व के एक गाँव में सिमट जाने के इस युग में अनुवाद पर चर्चा की सामयिकता को समझा जा सकता है। अनुवाद और तुलनात्मक अध्ययन की इस आवश्यकता एवं महत्ता को पहचानते हुए ही हमने द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया।

इस प्रकार की गोष्ठियों की वास्तविक सार्थकता तभी हो सकती है जब इसमें व्यक्त विचार एवं आमंत्रित आलेख पुस्तक रूप में स्थायी दस्तावेज़ के रूप में विद्वत् समाज के समक्ष आ सकें ताकि यह चर्चा और आगे बढ़ सके। यह पुस्तक इसी गोष्ठी में आमंत्रित लेखों को पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत किए जाने के संकल्प की अभिव्यक्ति है।

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Description

अखिल विश्व के एक गाँव में सिमट जाने के इस युग में अनुवाद पर चर्चा की सामयिकता को समझा जा सकता है। अनुवाद और तुलनात्मक अध्ययन की इस आवश्यकता एवं महत्ता को पहचानते हुए ही हमने द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया।

इस प्रकार की गोष्ठियों की वास्तविक सार्थकता तभी हो सकती है जब इसमें व्यक्त विचार एवं आमंत्रित आलेख पुस्तक रूप में स्थायी दस्तावेज़ के रूप में विद्वत् समाज के समक्ष आ सकें ताकि यह चर्चा और आगे बढ़ सके। यह पुस्तक इसी गोष्ठी में आमंत्रित लेखों को पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत किए जाने के संकल्प की अभिव्यक्ति है।

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