आदिवासी लोक विमर्श (साहित्य, रंगमंच, सिनेमा)

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वर्तमान साहित्यिक परिवेश में आदिवासी, दलित, स्त्री, किन्नर व अन्य विमर्श पर तीव्र गति से वार्ता हो रही है । यह पुस्तक भी आदिवासी विमर्श पर केन्द्रित है । जो आदिवासियों के संस्कृति, सभ्यता, परम्परा के साथ-साथ विस्थापन, अस्मिता, अस्तित्व आदि पर भी विचार विमर्श करती नजर आती है। आदिवासियों का साहित्य मौखिक रूप में तो कई हजार वर्षों पुराना साहित्य है । जिसके साक्ष्य आदिवासियों कि परम्परा, संस्कृति में बखूबी देखे जा सकते है।

लेकिन देश कि आजादी के बाद यह साहित्य आदिवासी भाषा में प्रखर रूप से उद्वेलित होने लगा । इसी उद्वेलन का रूप हिंदी साहित्य में पिछले 20 वर्षों से देखा जा रहा है। हिंदी में आदिवासी साहित्य पर कई कवितायेँ, उपन्यास, कहानियां, नाटक आदि अन्य विधाएं तीव्र गति से उभर चुकी है। निरंतर आदिवासी समाज पर लेखन का कार्य सुचारू व व्यवस्थित रूप में चल रहा है । इसी का एक प्रयास यह सम्पादित पुस्तक है। जिसमे लेखों को सम्पादित कर आदिवासी विमर्श को गति प्रदान करने का कार्य हुआ है ।

हिंदी आदिवासी विमर्श के प्रारम्भ, मध्य, वर्तमान व भविष्य में यह पुस्तक का सूक्ष्य स्थान रहेगा । पुस्तक के कार्य में संपादन स्वयं का तथा पुस्तक के प्रकाशक ने बहुत सहायता प्रदान कि। प्रकाशक का आभार प्रकट करते हुए, मै अपने सभी प्रिय साथियों, अध्यापकों, मार्गदर्शक का धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ । आपकी सहायता के बगैर यह कार्य न के बराबर अहसास कर रहा था । पुस्तक के सभी लेखकों का सहृदय आभार। आपने इतने कम समय में अपने महत्वपूर्ण लेखों के मुझे सराबोर किया ।

Author: Manish Kumar
SKU: ISBN: 978-81-939315-9-2 Category: Product ID: 270

Description

वर्तमान साहित्यिक परिवेश में आदिवासी, दलित, स्त्री, किन्नर व अन्य विमर्श पर तीव्र गति से वार्ता हो रही है । यह पुस्तक भी आदिवासी विमर्श पर केन्द्रित है । जो आदिवासियों के संस्कृति, सभ्यता, परम्परा के साथ-साथ विस्थापन, अस्मिता, अस्तित्व आदि पर भी विचार विमर्श करती नजर आती है। आदिवासियों का साहित्य मौखिक रूप में तो कई हजार वर्षों पुराना साहित्य है । जिसके साक्ष्य आदिवासियों कि परम्परा, संस्कृति में बखूबी देखे जा सकते है।

लेकिन देश कि आजादी के बाद यह साहित्य आदिवासी भाषा में प्रखर रूप से उद्वेलित होने लगा । इसी उद्वेलन का रूप हिंदी साहित्य में पिछले 20 वर्षों से देखा जा रहा है। हिंदी में आदिवासी साहित्य पर कई कवितायेँ, उपन्यास, कहानियां, नाटक आदि अन्य विधाएं तीव्र गति से उभर चुकी है। निरंतर आदिवासी समाज पर लेखन का कार्य सुचारू व व्यवस्थित रूप में चल रहा है । इसी का एक प्रयास यह सम्पादित पुस्तक है। जिसमे लेखों को सम्पादित कर आदिवासी विमर्श को गति प्रदान करने का कार्य हुआ है ।

हिंदी आदिवासी विमर्श के प्रारम्भ, मध्य, वर्तमान व भविष्य में यह पुस्तक का सूक्ष्य स्थान रहेगा । पुस्तक के कार्य में संपादन स्वयं का तथा पुस्तक के प्रकाशक ने बहुत सहायता प्रदान कि। प्रकाशक का आभार प्रकट करते हुए, मै अपने सभी प्रिय साथियों, अध्यापकों, मार्गदर्शक का धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ । आपकी सहायता के बगैर यह कार्य न के बराबर अहसास कर रहा था । पुस्तक के सभी लेखकों का सहृदय आभार। आपने इतने कम समय में अपने महत्वपूर्ण लेखों के मुझे सराबोर किया ।

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