“मैं बहुत धीरे-धीरे चलने वाला आदमी हूँ”- रामदरश मिश्र

(हिंदी के सुपरिचित प्रसिद्ध  कवि, कथाकार, आलोचक रामदरश मिश्र जी से प्रियंका कुमारी की बातचीत)  

प्रश्न- आपका जन्म कहाँ और किस परिवेश में हुआ।

उत्तर- 15 अगस्त 1924 को  गोरखपुर जिले के गांव डुमरी में मैं पैदा हुआ।  यह गांव कछार में दो नदियों के बीच में स्थित है। बरसात के दिनों में जब  दोनों नदियां उफनती है  तो बाढ़ आती थी।  बाढ़ खेतों के सभी फसलों को बहा ले जाती थी और लोगों के घरों में गरीबी, अभाव छोड़ जाती थी।  इसी अभावों से भरे गांव के एक घर में मैं भी पैदा हुआ।  मेरे पैदा होने के साथ ही एक घटना जुड़ी हुई थी,  जब मैं पैदा हुआ तो मां अचेत अवस्था में थी। मां को कोई होश नहीं था इसलिए मेरे आस-पास कीड़े मकोड़े इकट्ठा हो गये थे।  वह तो बुआ ने देखकर मुझे झट से उठा लिया नहीं तो मुझे कीड़े मकोड़े चट कर जाते । मैंने एक जगह लिखा भी है कि मेरे जीवन में कीड़े मकोड़े बहुत मिलें लेकिन उससे उबारने वाले भी बहुत मिले।  गांव का परिवेश था । मेरे गाँव ने गरीबी से कैसे संघर्ष किया जाता है यह सब भी हमें सिखाया।  आर्थिक अभावों के बाद भी कैसे खुश रहा जाता है कैसे गाया-बजाया जाता है, कैसे त्योहारों में उमंगों के साथ रहा जाता है। यह सब  हमें उस गांव ने सिखाया गांव की प्रकृति ने सिखाया।

प्रश्न  आपकी शिक्षा-दीक्षा कहाँ और कैसे हुई?

उत्तर-    मुझे सबसे पहले घर में अक्षर ज्ञान कराया गया लेकिन मुझे समझ नहीं आया। भाई के साथ-साथ और भी लोगों  ने  प्रयास किया लेकिन मुझे अक्षर का ज्ञान नहीं हुआ। मेरी मां साक्षर थी दूसरे लोगों का फैसला उन्हें कबूल नहीं हुआ  और उन्होंने स्वंय एक दिन  कोशिश की जाड़े के दिन चुल्हे की राख को बाहर खींचकर उंगलियों से मां ने कहा लिखो और मैंने उसे लिखा।  अक्षर लिखकर मुझे ऐसा लगा कि मां के स्पर्श से मेरे उंगलियों से अक्षर झरने लगे  और धीरे-धीरे मुझे अक्षरों का ज्ञान होने लग गया और जब मुझे वर्णमाला का ज्ञान हो गया तब मेरी यात्रा चल पड़ी और उसके बाद मैं कुछ घर में सिखता , कुछ कक्षा में तो कुछ खुद से सीखता था। कुल मिलाकर मैं कक्षा का अच्छा विद्यार्थी माना जाने लगा और आखिर तक मेरी यही विशेषता बनी रही ।

उस कछार के क्षेत्र में संयोग से प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल भी था जहां से मैंने अपनी पढ़ाई की  उसके बाद की पढ़ाई शहर से दूर जाकर इंग्लिश में शिक्षा प्राप्त करना था, गरीबी के कारण यह सब संभव नहीं था। उस समय शिक्षक बनने के लिये एक विशेष परीक्षा होती थी गांव से 10 किलोमीटर दूर पंडित रामकुमार शुक्ला थे उनके पास गया वह स्वंय मैट्रिक थे लेकिन मैट्रिक  की तैयारी कराते थे । लगभग 2 साल तक मैंने तैयारी की लेकिन अंग्रेजी में फेल हो गया । राम कुमार शुक्ला ने कहा कि कवि काशीनाथ विद्यापीठ में पत्रकारिता का कोर्स शुरू हो रहा है। वह राष्ट्रीय संस्था है वहां हिंदी का सम्मान होगा तो तुम वहां जाओ। वहाँ जाने के बाद मैंने कोचिंग क्लास शुरु की कैंब्रिज अकादमी  का एक प्राइवेट स्कूल था जहां से मैंने मैट्रिक पास किया और मैं कक्षा में प्रथम आया ।  इसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से  इंटर पास किया  तथा वहीं से  एम.ए तथा पीएचडी की डिग्री प्राप्त की

प्रश्न- आपने अपने कर्म-जीवन(अध्यापन) की शुरुआत कहाँ से की क्या उसमें आपको किसी प्रकार का  संघर्ष का सामना करना पड़ा?

उत्तर-     बिल्कुल छात्र जीवन में संघर्ष के बाद अध्यापन  के क्षेत्र में आने में संघर्ष का सामना मैंने किया।   जब मैंनें  बी. एच. यू. से एम.ए. की डिग्री ली उसके बाद वही अस्थाई प्राध्यापक हो गया । साथ ही शोध कार्य प्रारंभ किया अस्थाई नीति से तात्कालिक राहत के साथ-साथ भविष्य का भी उम्मीद थी कि शायद स्थाई रूप से ले लिया जाउँ।   अप्रैल में नियुक्ति का समय पूरा हो गया  फिर इंटरव्यू दिया उम्मीद थी कि  नौकरी मिल जायेगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।  । कुछ दिन बाद  पंडित जी (हजारी प्रसाद द्विवेदी) ने बताया कि उन्होंने यूजीसी सेलेक्शन के द्वारा 2 स्थाई जगह मांगे थे उन्हें विश्वास था कि जगह मिल जाएगी एक पर नामवर सिंह जी को और एक मेरे लिये । यहां 2 महीने तक आमदनी ना मिली और ऊपर से यूजीसी ने दो जगह में से केवल एक ही जगह की स्वीकृति दी।  मैरे एक मित्र ने बताया कि  पंडित जी बहुत दुखी है क्योंकि एक ही जगह की स्वीकृति मिलि तो मैंने जाकर गुरु जी से कहा कि आप नामवर जी को दीजिये।  इससे पंडित जी का काम आसान हो गया पंडित जी ने फिर मुझे सौ रु.  की छात्रवृति दिलाई।  उसके बाद एक के बाद एक  बीएचयू के इंटर कॉलेज में लेक्चरर  के लिये साक्षात्कार दिए लेकिन कहीं नहीं हुआ।  उसके बाद बड़ौदा के सयाजीराव कॉलेज में आवेदन पत्र दिया था वहां महाराजा पीजी कॉलेज में  नियुक्ति हो गई । अहमदाबाद के सेंट जेवियर्स कॉलेज से निमंत्रण आने पर बड़ौदा छोड़कर अहमदाबाद चले गए जो । उसके बाद नवसारी चले आए जहां एचडी गार्डी कॉलेज में एक साल का तक अध्यापन कार्य किया। फिर गुजरात आ गया। वहां जैविर्यस कॉलेज में हिन्दी का नया कोर्स बना और उसमें हिन्दी विषय को नहीं रखने के कारण मुझे निकाल दिया गया। क्योंकि वहाँ अब मेरी आवश्यकता नहीं थी वहाँ सबसे ज्यादा तनख्वाह मेरी ही थी इसलिये  सबसे पहले मुझे ही विवश किया गया।  उसके बाद आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान में साक्षात्कार दिया लेकिन नहीं हुआ।  नागपुर विश्वविद्यालय में आवेदन पत्र दिया वहाँ नौकरी की संभावना थी।  किंतु इंटरव्यू लेटर ही नहीं मिला अंत में  दिल्ली आ गया  उमाशंकर जोशी ने कहा आप जहाँ जा रहे हैं आपको वास्तव में वहीं होना चाहिये था। दिल्ली यूनिवर्सिटी के कई कॉलेजों में उस समय जगह निकली थी तो उस समय मुझे डॉ. नगेन्द्र जी ने नियुक्त किया और अंत तक यहीं बना रहा।

प्रश्न- लेखन के प्रति आपके मन में रुचि कब जगी एवं  आपकी लेखन के प्रेरणा स्त्रोत क्या है ?        

उत्तर-  जब मैं दर्ज़ा छः  में था तब मुझे इतना महसूस हुआ था कि मैंने कविता लिखी है। जब मैं स्कूल में था तब वहाँ  कांग्रेस की सभा हो रही थी।  मैंने उसी पर कविता लिखी तो मेरी जो कविता है वह समाज से शुरू हुई । कविता मेरे भीतर की उपज थी, लेकिन कई वर्षों तक शिक्षा के क्रम में उस देहाती परिवेश में ही रहा। जिनमें नए साहित्य की सर्जना का कोई वातावरण नहीं था। बस मैं अपनी गति से लिखता जा रहा था।  छन्द, अलंकार आदि का अभ्यास कर रहा था और हिंदी साहित्य के जो गुरु थे उनसे प्रोत्साहन प्राप्त कर रहा था। कविता में और भाषा में जो निखार स्वतः आ रहा था, वो आ रहा था लेकिन मुझे ठीक ज्ञान नहीं था कि उस समय कविता का मिजाज और भाषा का रूप कैसा है। सन 1945 में बनारस पहुँचने के बाद मैंने अपने को नए साहित्यकार के रूप में पाया और वहाँ से मेरी काव्य यात्रा प्रारंभ हुई। 1960 के आसपास कविता के साथ-साथ मैंने कहानी भी लिखनी शुरू कर दी। उसके बाद सन् 1961 मैं मेरा पहला उपन्यास आया ‘पानी के प्राचीर.’ फिर  कविता, कहानी और उपन्यास ये तीनों मेरी मुख्य विधाएँ हो गयी. इसके साथ ही मैंने  यात्रा-वृत्तान्त, डायरी, निबंध और आत्मकथा भी लिखी.

 प्रश्न- आपने अपने लेखन के  लिये क्या विशेष प्रक्रिया अपनाई है?   

उत्तर- मैं आपको एक बात बताना चाहता हूँ कि मैंने लिखने की प्रक्रिया के विषय में कुछ भी नहीं सोचा जो मन में आया लिखता चला गया। मेरे जीवन में बहुत से अनुभव हैं उसे में डायरी में उतार रहा हूँ। मैंने यह अनुभव किया कि मैं अपनी शक्ति भर साहित्य रच चुका हूँ और रचता जा रहा हूँ। मैं ‘अपने लोग’ को अपना सर्वश्रेष्ठ उपन्यास मानता हूँ ‘और जल टूटता हुआ’ को भी इसी के समकक्ष रखता हूँ। मैं कहना यह चाहता हूँ, मैं अपने हर प्रकार के लेखन से संतुष्ट हूँ. उपन्यास और आत्मकथा भी दी साहित्य को. एक लम्बी आत्मकथा है उपन्यास के रूप में जिसमें बचपन से लेकर आज तक के समय में व्याप्त परिवेश की विविधता का चित्रण हुआ है। यह मेरी राम कहानी नहीं है, यह एक सामाजिक दस्तावेज भी है। मैंने गीत, गजल, छोटी कविताओं के साथ-साथ बड़ी लम्बी कवितायें भी लिखी हैं। मुझे अब तड़प नहीं है कि मैं यह नहीं लिख पाया वो नहीं लिख पाया और न ही कि मैं कल महान लेखक बनूँगा। मैं अपने लेखन से संतुष्ट हूँ और आज भी लिख रहा हूँ।

प्रश्न- आपने विविध विधाओं (कविता, कहानी,उपन्यास, आलोचना,जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण) में लिखा है लेकिन किस विधा ने आपको बहुत अधिक आकर्षित किया?

उत्तर- जी हाँ मैंने विविध विधाओं में लेखन किया है और सभी मुझे प्रिय भी हैं और आकर्षित भी करती हैं। साहित्यकार की हैसियत से, लेकिन एक लेखक की हैसियत से कविता ही मेरे बहुत निकट रही है। लेखन का प्रारंभ कविता से ही किया, उसके बाद कहानी में आया, फिर उपन्यास में आया और गाहे-बगाहे अनेक विधाओं में लिखा। लेकिन  कविता मुझे प्रिय है और कविता मेरी हर विधा के साथ लगी रही। चाहे निबंध लिख रहा हूँ, चाहे कहानी लिख रहा हूँ, चाहे मेरी आत्मकथा हो, कविता का एक जो अपना दबाव या प्रसन्न प्रभाव है, मेरे अन्य लेखन पर भी रहा है। कविता  ने ही मुझे बहुत आकर्षित किया है।

प्रश्न- आप काव्य से कथा साहित्य में कैसे आये?

उत्तर- एक बात बताऊँ कि बहुत से लोगों ने कविता से शुरुआत की और कथा में आकर कविता छोड़ बैठे। जब वे लोग कहते है कि वे कविता से कहानी में आये, तो मैं कहता हूँ मैं कविता के साथ आया। बी.एच.यू में गोष्ठी होती थी उसमें कई बड़े- बड़े कहानीकार भी आते थे।  उसमें शिवप्रसाद जी भी थे धीरे-धीरे कहानी मेरे अंदर समाहित होती गयी उस समय ने मुझे आकर्षित किया और मैं कथा साहित्य लिखने लगा। लेकिन इसके बाद भी कविता मेरी आद्योपांत चलती रही उस समय बनारस की पत्रिकाओं से कविता टिप्पणी के साथ लौट आती थी । एक दिन मेरे गुरूजी हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा कवि तुम निराश मत होना तुम चाय, सिगरेट नहीं पीते इसलिए तुम पैसे डाक पर खर्च करो फिर मैं हर जगह भेझता रहा और फिर मेरी कविता भी पत्रिका मैं छपने लगी और साठ के बाद धीरे-धीरे पत्रिकाएं मुझसे जुड़ने लगी।  उसके साथ कथा साहित्य भी चलता रहा। वह मुझसे बाद में जुड़ा लेकिन यह कविता की तरह ही प्रिय रहा।  खास करके उपन्यास तो मुझे बहुत प्रिय रहा, क्योंकि जो बात मैं कविता-कहानी में नहीं कह सकता, वह उपन्यास में मैंने कही। जीवन को जिस समग्रता से कोई और विधा नहीं देख पाता। एक बार जब मैं उपन्यास में फंसा तो फंसता ही गया और लगभग ग्यारह उपन्यास आ गये।

  1. आपने सर्जनात्मक रचना की  और आलोचना  भी लिखीं,   दोनों के लिये क्या आपको अलग-अलग   तैयारियां करनी होती थीं?  

उत्तर-     अधिकांश लोग मुझे आलोचक मानते हैं,  लेकिन मैं खुद को सर्जक मानता हूं  और यह सर्जना स्वतः हुआ है।  आलोचना दबाब के साथ आई । जब मैं पी.एच.डी. कर रहा था तो धन का अभाव था । एक पत्रिका पटियाला से निकलती थी उसमें मैं निबंधात्मक लेख देता ता उससे कुछ पैसे मिलता था। पीएचडी करने के बाद जब मैं गुजरात मैं था तब राजकमल एक ग्रंथ माला प्रकाशित कर रहा था, उन्हें  हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सुझाव दिया कि उपन्यास पर रामदरश मिश्र से लिखवाये तो मैंने     हिन्दी उपन्यासः एक अन्तर्यात्रा  पुस्तक  लिखी लेकिन वह दबाब से ही लिखी। ऐसे ही हिंदी कहानीः एक अंतरंग पहचान आई। डॉ. नगेन्द्र जी  हिंदी वांग्मय ग्रंथ संपादित कर रहे थे तो उन्होनें हिंदी कहानी पर राजेंद्र यादव को लिखने को कहा था लेकिन किसी कारण से फिर उन्होंने मुझे कहा कि तुम लिखो फिर मैंने लिखा। इसी तरह नागरी प्रचारिणी से इतिहास पर 13 खंड प्रकाशित हो रहे थे । उसमें छायावाद पर नगेंद्र जी को लिखना था लेकिन उन्होंने कहा तुम लिख दो तो मैंने उनके आग्रह पर लिखा दिया। इसलिये मैं अपने आप को आलोचक नहीं मानता हूँ । मैं मानता हूँ कि आलोचना के लिए कुछ पूर्व का कुछ पश्चिम का पढ़ना होता है लेकिन उसमें मेरा लगाव नहीं था। पात्रों की सर्जना करते हुये रचनाकारों को बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है क्योंकि यदि पात्रों की सर्जना गलत हो गई तो लेखक को उसका जबाब भी देना होता है।

प्रश्न- क्या आपको लेखन के कारण किसी प्रकार का संघर्ष करना पड़ा?  

उत्तर-  मुझे अपने व्यक्तिगत जीवन में लिखने के कारण संघर्ष नहीं करना पड़ा, वरन इसके विपरीत सम्मान और यश मिलता रहा। हाँ, लेखक बनने के लिए मुझे बहुत संघर्ष करना पड़ा। शुरू के दिनों में भेजी गई कवितायें छपती नहीं थीं। मैंने हार नहीं मानी. डाक से कवितायें पत्रिकाओं को भेजता रहा। मेरे संघर्ष का प्रतिफल साहित्य आज समाज के सामने है ।

प्रश्न- आपके अधिकतर साहित्य में ग्रामीण परिवेश  केंद्र में  है। इनमें आप पात्र  और परिवेश की सर्जना कैसे करते हैं। क्या कारण है कि  आप गांव को आज भी इतनी शिद्दत से याद करते हैं?

उत्तर- मैं गांव से कभी अलग नहीं हुआ वहां की सुंदरता वहां का लोकाचार संस्कृति व  वहां के सुख-दुख, संस्कृति, समस्याएं सब कुछ मेरे भीतर अभी तक समाया हुआ है । इसलिए मेरे लेखन में ग्राम दिखता है।  जो लोग शहर आते हैं, वे शहर नहीं आते बल्कि चकाचौंध की दुनिया में आते हैं। वे आते ही शहर का चिकनापन ओढ़ लेते हैं। गांव मुझे इसलिए याद आता है क्योंकि मुझे गांव ने जो दिया प्रामाणिक दिया। मुझे उसे याद नहीं करना पड़ता, वह मेरे अंदर ही रहता है। मेरी रचनाओं में भी मैं काल्पनिक कुछ नहीं रचता। गांव में व संपन्न तो होती है प्रकृति संपन्न तो होती है उसमें पेड़-पौधे सौंदर्य का सुख मुझे मिला मेरा अनुभव बनकर वह मेरे साहित्य में भी दिखाई देता है। मेरे लिये  गांव का अर्थ केवल कच्चे-रास्ते, खेत और पगडंडी मात्र नहीं है। बल्कि मेरे लिये गाँव अपनी संपूर्ण प्रकृति और प्रकृति से जुड़ी संपूर्ण संस्कृति होती है । गांव में आप हर  घर को जानते हो । गांव में एक की  बेटी सब की बेटी, किसी का दामाद पूरे गाँव भर का दामाद होता है यहाँ तक कि किसी का भाँजा भी पूरे गाँव का भाँजा होता है। जबकि शहरों में अपने पड़ोसी तक के बारे में मालूम नहीं होता। हर शहर के भीतर कई गांव बसे होते। मैं शहर और शहर के भीतर बसे गांव या गांव के ग्रामीण परिवेश में रहता हूं । वहां जमीन से जुड़े लोग हैं, श्रमजीवी लोग हैं इन के बीच रहना मुझे अच्छा लगता है। मेरा गांव तो दो नहरों से घिरा हुआ बहुत ही सुंदर है। जहाँ पोखर, बाग-बगीचा, बसंत, फगुआ गाना, पर्व –त्योहार यह सब गांव की विशेषता रही है।  प्रकृति के सानिध्य में तरलता ने मुझे हमेशा बांधे रखा तो यह मेरी रचना से कैसे दूर रहती।

प्रश्न- महानगरीय जीवन  की आपके लेखन में क्या भूमिका रही है?       

उत्तर-      महानगर की बात करुँ तो ऐसा नहीं कि महानगर ने मुझे सिर्फ काम या  बुराई दी है।  इस महानगर ने दृष्टि की व्यापकता दी है मेरे समझ का दायरा बढ़ाया है।  जब तक मैं गांव में था तो आज क्या लिखा जा रहा है कैसा लिखा जा रहा है कहां पता था मुझे। मैं तो छायावादी शैली में कविताएं लिखता था। काशी विद्यापीठ में नामांकन के बाद बहुत कुछ जाना फिर लेखन शैली बदली। बड़े-बड़े विद्वान साहित्यकारों से मिलने का सौभाग्य मिला, उनका मुझे मार्गदर्शन मिला, साधन-संसाधन मिले। अपने भावों और विचारों को पुस्तकीय रूप देने के लिए सहायक प्रकाशक मिले।     बहुत कुछ मिला मुझे । हम किसी परिवेश से क्या लेते हैं यह हमारे ऊपर निर्भर होता है । मैंने पहले भी बताया कि गांव मेरे अंदर हमेशा बसा रहता है। इसलिए गांव की सरलता आज तक मेरे  अंदर है और महानगर का दंभी स्वभाव मुझे छू नहीं पाया।  गाँव ने मुझे विपुल अनुभव के भंडार दिये। मेरी रचना में जो चरित्र हैं वह काल्पनिक नहीं है। मेरी जो रचनायें हैं वह मेरी रचनायें नहीं हैं बल्कि वह मेरे परिवेश की रचनायें हैं। मेरे गाँव का परिवेश ही मेरे अनुभव  बनकर रचनाओं में सृजित होता गया।

प्रश्न-  आप अपने समय के साहित्यिक परिवेश को किस रूप में देखते हैं जिसके आप द्रष्टा और भोक्ता रहे हैं, और आज के साहित्यिक परिवेश को  आप किस तरह देखते हैं?
उत्तर- मेरे समय के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा वह है जब मैं घूमने फिरने में, आने जाने में कभी सक्रिय रहा और गोष्ठियों-सभाओं में भी जाया करता था और अपने समय के अनेक साहित्यकारों से मिलना-जुलना होता था, आना-जाना होता था। तो उन दिनों का मेरा अनुभव है कि वह बड़ा अच्छा समय था। उन दिनों अच्छे कवि और गद्यकार तो थे ही, उनमें आपस में बडा भाईचारा था। एक पारिवारिकता थी। मैं माडल टाउन में था, उस समय अनेक स्थानों से अच्छे साहित्यकार, नए-नए लेखक आ गए थे और आए दिन गोष्ठियां होती थीं। लोग एक-दूसरे को सुनते सराहते थे। यहां तक कि हमारे घर कई बड़े-बड़े साहित्यकार आए, उनसे बातचीत हुई  तो मेरे ख्याल से वह समय मुझे बहुत मूल्यवान लगता है।

उससे पहले का भी समय बहुत प्रीतिकर था जब मैं बनारस में था. वहां हम नए साहित्यकार उठ रहे थे, और एक दूसरे से शक्ति प्राप्त कर रहे थे। कह सकता हूं कि हम लोगों के बनने की प्रक्रिया में उन गोष्ठियों का बड़ा हाथ था जो प्रायः वहां होती रहती थीं। अब इस समय तो मैं घर में बंद-सा हो गया हूँ। लोगों के यहां आना-जाना भी अब नहीं हो पाता है इसके साथ ही जो इस वक्त लिखा जा रहा है, चाहे वह कविता हो या कथा साहित्य हो, उससे सम्यक रूप से गुजरने का अब अवसर नहीं मिल पाता है। अवसर तो है लेकिन मन को वह अवसर प्राप्त नहीं हो रहा है और मुझे यह भी लगता है कि इस वक्त साहित्यकारों के मिलने-जुलने का, एक-दूसरे के साथ हो लेने का परिदृश्य सूना हो गया है। अगर परिदृश्य है तो भी उन लोगों का है जो एक विचारधारा के हैं, यानी अलग-अलग विचारधाराओं के साहित्यकारों का परस्पर साहचर्य अब दिखाई नहीं पड़ता। सभा-संगोष्ठियों का रूप भी अब पहले जैसा नहीं रहा।

प्रश्न- कहानी-कविता में उभरी नई पीढ़ी बहुत तेजी से सोशल मीडिया पर सक्रिय है। नई पीढ़ी के रचनाकारों के इस प्रवृत्ति को आप किस रूप में देखते हैं? इन नवोदित रचनाकारों का आप कुछ मार्गदर्शन करेंगे?

उत्तरः      मार्गदर्शन तो दो तरह से होता है। एक तो यह कि आप जो लिख रहे हैं, वह अपने समय के साथ हो और आने वाली पीढ़ियों को महसूस हो कि आज के लेखन का यह सही स्वरूप हो सकता है। यानी कि वे आपके साहित्य को पढ़कर मार्गदर्शन पाएँ और इस सन्दर्भ में एक बात बड़े महत्त्व की है। आपकी सर्जना और आपके विचार ऐसे हों जो नई पीढ़ियों को किसी तरह बांधते नहीं हों। ऐसा न हो कि आप उन्हें एक खास विचार धारा में, एक खास तरह के शिल्प में जकड दें और वे उसी जकडबंदी में मुब्तला होकर अपना रचना कार्य करते रहें।

दूसरा रास्ता यह होता है कि नए लेखक आपसे मिलें। अपनी रचनाएं दिखाएँ आपको। आप उनकी रचना का सही-सही आकलन करके उनको उनकी शक्ति और अशक्ति की पहचान कराएँ या उनकी रचना के प्रकाशन और प्रचार के लिए यथा संभव कुछ करें। मेरे पास जो भी नवोदित आते हैं, मैं उन्हें खुले मन से सुनता हूँ, उन्हें मार्गदर्शन करता हूँ। अभी के नवोदित रचनाकार फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया पर जो इतने सक्रिय है उनसे यही कहना चाहता हूँ कि सोशल मीडिया से भले ही आपको ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े लेकिन यह स्थाई माध्यम नहीं है। जब आपकी रचना कहीं छपते हैं तो वह स्तरीय मानी जाती है और स्थाई भी। बस मैं एक बात और कहना चाहता हूँ जितना पढ़ोगे उतना ही लेखन निखरेगा।

लेखक के बारे में-

(रामदरश मिश्र हिन्दी साहित्य संसार के बहुआयामी रचनाकार हैं। उन्होंने गद्य एवं पद्य की लगभग सभी विधाओं में सृजनशीलता का परिचय दिया है और अनूठी रचनाएँ समाज को दी है। चार बड़े और आठ लद्यु उपन्यासों में मिश्र जी ने गाँव और शहर की जिन्दगी के संश्लिष्ट और सघन यथार्थ की गहरी पहचान की है। मिश्र जी की साहित्यिक प्रतिभा बहुआयामी है। उन्होंने कविताकहानीउपन्यास, आलोचना और निबंध जैसी प्रमुख विधाओं में तो लिखा ही है, आत्मकथा- सहचर है समय, यात्रा वृत्त तथा संस्मरण भी लिखे हैं। यात्राओं के अनुभव तना हुआ इन्द्रधनुषभोर का सपना तथा पड़ोस की खुशबू में अभिव्यक्त हुए हैं। उन्होंने अपनी संस्मरण पुस्तक स्मृतियों के छन्द में उन अनेक वरिष्ठ लेखकों, गुरुओं और मित्रों के संस्मरण दिये हैं जिनसे उन्हें अपनी जीवन-यात्रा तथा साहित्य-यात्रा में काफी कुछ प्राप्त हुआ है। ये रचना-कर्म के साथ-साथ आलोचना कर्म से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने आलोचना, कविता और कथा के विकास और उनके महत्वपूर्ण पड़ावों की बहुत गहरी और साफ पहचान की है। ‘हिन्दी उपन्यास : एक अंतयात्रा, ‘हिन्दी कहानी : अंतरंग पहचान’, ‘हिन्दी कविता : आधुनिक आयाम’, ‘छायावाद का रचनालोक’ उनकी महत्त्वपूर्ण समीक्षा-पुस्तकें हैं।

मिश्र जी ने अपनी सृजन-यात्रा कविता से प्रारंभ की थी और आज तक ये उसमें शिद्दत से जी रहे हैं। उनका पहला काव्य संग्रह ‘पथ के गीत’ 1951 में प्रकाशित हुआ था। तब से आज तक उनके नौ कविता संग्रह आ चुके हैं। ये हैं – ‘‘बैरंग-बेनाम चिट्ठियाँ’, ‘पक गयी है धूप’, ‘कंधे पर सूरज’, ‘दिन एक नदी बन गया’, ‘जुलूस कहां जा रहा है’, ‘आग कुछ नहीं बोलती’, ‘बारिश में भीगते बच्चे और ‘हंसी ओठ पर आँखें नम हैं’, (गजल संग्रह)- ‘ऐसे में जब कभी’, नवीनतम काव्य संग्रह प्रेस में है। रामदरश मिश्र ने समय-समय पर ललित निबंध भी लिखे हैं जो ‘कितने बजे हैं? तथा ‘बबूल’ और ‘कैक्टस’ में संगृहीत हैं। इन निबंध ने अपनी वस्तुगत मूल्यत्ता तथा भाषा शैलीगत सहजता से लेखकों और पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है। मिश्र जी ने देशी यात्राओं के अतिरिक्त नेपाल, चीन, उत्तरी दक्षिणी कोरिया, मास्को तथा इंग्लैंड की यात्राएं की हैं।

प्राय: सभी भारतीय भाषाओं में मिश्र जी की कविताओं और कहानियों के अनुवाद हुए हैं। उनका एक उपन्यास ‘अपने लोग’ गुजराती में अनूदित है। उनकी रचनाओं विभिन्न स्तरों के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही हैं और देश के अनेक विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर अनेक शोध् कार्य हो चुके हैं और लगातार हो रहे हैं। मिश्र जी देश की अनेक साहित्यिक और अकादमिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किये जा चुके हैं। 21 अप्रैल 2007 को पटना में प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका “नई धारा” द्वारा तृतीय उदयराज सिंह स्मारक व्याख्यान तथा साहित्यकार सम्मान समारोह में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ॰ रामदरश मिश्र को “उदयराज सिंह स्मृति सम्मान” से सम्मानित किया। उनकी अनेक कृतियाँ पुरस्कृत हुई हैं। ये अनेक साहित्यिक, अकादमिक और सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष रह चुके हैं। कई लघु पत्रिकाओं के सलाहकार संपादक हैं।)

( इस पूरे उपक्रम के मूल में दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज के हिन्दी विभाग के एसोसिएट प्रो. और कवि डॉ. जसवीर त्यागी सर रहें । मैं विशेष रूप से उनका आभार व्यक्त करती हूँ)

-प्रियंका कुमारी

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