‘असम की भाषा-समस्या’ -डॉ. जाहिदुल दीवान

असम की भाषा-समस्या

डॉ. जाहिदुल दीवान

Post-Doctoral Fellow

ICSSR, New Delhi

असम पूर्वोत्तर भारत का प्रमुख राज्य है। यह राज्य पूरी तरह मिश्रित संस्कृति का वाहक है। एक तरफ़ इसमें पहाड़ी संस्कृति के लोग हैं, तो दूसरी तरफ़ मैदानी संस्कृति की जनसंख्या भी काफी मात्रा में हैं। हम जानते हैं, किसी भी जगह की संस्कृति, उस जगह से जुड़ी सारी चीज़ों से मिलकर बनती है। मसलन- भाषा-समाज, खान-पान, पोशाक-परिधान, उत्पदान पद्धति आदि सभी चीज़ों का योगदान संस्कृति की निर्मिति में रहता है। दूसरी बात, जब किसी जगह पर ऐसे लोग रहते हैं, जिनमें ऊपर उल्लिखित सभी तत्व एक समान पाए जाते हैं, तो वहां एकल संस्कृति विकसित होती है। लेकिन जहां उल्लिखित तत्वों में विभिन्न कारणों से विविधता दिखाई पड़ती है, वहां मिश्रित संस्कृति जन्म लेती है। असम ऐसी ही मिश्रित संस्कृति का एक राज्य है। इसीलिए पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों से असम की परिस्थिति काफी भिन्न पायी जाती है।

असम में भाषा एवं संस्कृति को लेकर बाहरी-भीतरी की अवधारणा आज भी प्रबल है। इसी भावना के चलते असम में कई बार बड़े स्तर पर सामाजिक आंदोलन भी हुए हैं। उन सामाजिक आंदोलनों ने जब-जब राजनैतिक रूप लिया, तब-तब बड़ी मात्रा में तबाही भी मची है। उन आंदोलनों में असंख्य लोगों ने अपनी जान गवायी है। ऐसे लोगों को असम में ‘भाषा शहीद’ का दर्जा दिया गया है। कुछ भाषा शहीदों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में भी दर्ज हैं। असम में भाषा का मुद्दा आज भी पूरी तरह हल नहीं हुआ है। गाहे-बगाहे कुछ लोग गड़े मुर्दे उखाड़ने की तरह इस मुद्दे को हवा देते रहते हैं। रंगा-सियार सरीखे छद्म भेषी उन तथाकथित नेताओं को लोगों में विभाजन पैदा करके कई तरह के फायदे मिलते होंगे।

असम में कितने भाषिक समुदाय के लोग रहते हैं, निश्चित रूप से कह पाना मुश्किल है। क्योंकि यह एक ऐसा राज्य है, जहां पूरे भारत से लोग आकर बसे हैं। सरसरी तौर पर देखा जाए तो  असम में निम्नांकित भाषाओं और बोलियों का प्रयोग किया जाता हैः- असमीया भाषा, अहोम भाषा, कछारी भाषा, कामरुपी भाषा, कार्बी भाषा, कोच भाषा, चकमा भाषा, ज़ेमे भाषा, डिमाश भाषा, तिवा भाषा, देओरी भाषा, नोक्टे भाषा, बियाटे भाषा, बोड़ो भाषा, ब्रजावली भाषा, मिसिंग भाषा, म्हार भाषा, राजबोंग्शी भाषा, वाँचो भाषा, हफ़लौंग हिन्दी इत्यादि। इसके अतिरिक्त हिंदी भाषा, नेपाली भाषा, मियाँ भाषा, बांग्ला भाषा, मारवाड़ी भाषा, बागानीया भाषा, पंजाबी भाषा आदि बोलने वाले भी असम में काफी संख्या में पाए जाते हैं। ऊपर जितनी भी भाषाओं का उल्लेख किया गया है, उनसे जुड़ी संस्कृतियां भी अमसीया समाज में जीवंत हैं। समाजभाषाविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो भाषा सम्पर्क, भाषिक आदान, भाषाद्वैत (डायग्लोसिया), द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकता, कोड-मिश्रण और कोड-परिवर्तन, भाषिक परिवृत्ति, मातृभाषा अनुरक्षण; जैसी सभी प्रवृत्तियां असम के भाषिक परिदृश्य में दिखाई पड़ती हैं।

आज से कई दशक पहले असमीया भाषा को असम की प्रमुख भाषा बना दी गयी थी। इस निर्णय को लेकर असम के दोनों घाटियों (ब्रह्मपुत्र और बराक) में जोरदार विरोध परिलक्षित हुआ था। सबसे ज्यादा विरोध बांग्ला भाषी लोगों की ओर से हो रहा था। सन् 2011 की जनगणना के अनुसार असम की कुल जनसंख्या का 28.92 प्रतिशत लोग बांग्ला भाषी हैं, वहीं 48.43 प्रतिशत लोग असमीया भाषी हैं। जब असमीया भाषा को असम की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी, तो बांग्ला भाषी लोगों ने उसका विरोध करते हुए कहा कि असमीया एक दक्ष भाषा नहीं हैं, इसीलिए इसे एक राज्य की प्रमुख भाषा बनाने की मांग बिल्कुल गलत है। साथ ही उन लोगों ने यह भी तर्क दिया  कि बांग्ला एक समृद्ध भाषा है, असमीया भाषा-साहित्य के विकास में बांग्ला भाषा का योगदान अविस्मरणीय है। अतः बांग्ला भाषा को असम की प्रमुख भाषा घोषित किया जाना चाहिए।

भाषा की इस लड़ाई में असमीया की जीत हुई। सन् 1964 में असमीया भाषा को संवैधानिक दर्जा दी गयी। इससे पहले सन् 1836 से बांग्ला भाषा असम प्रांत की आधाकारिक भाषा के रूप में विराजमान थी। जिस समय कानूनी तौर पर असमीया ने बांग्ला की जगह ली, उसके आस-पास बांग्ला के लिए भी एक छोटा सा प्रावधान किया गया था। सन् 1967 में असम राजभाषा अधिनियम 1960 की धारा 5 के तहत बांग्ला भाषा को असम की एक आधिकारिक भाषा के रूप में निर्दिष्ट किया गया था। लेकिन यह किस्सा यहीं पर खत्म नहीं हुई। 30 नवंबर, 2013 की बात है; असम सरकार ने एक परिपत्र जारी किया था, जिसमें राज्य के सभी जिलों के उपायुक्तों से असमीया को आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग करने के लिए कहा गया था। इस निर्णय का असम के तीन बराक घाटी जिलों- कछार, करीमगंज और हैलाकांडी में काफी विरोध हुआ था। बाद में राज्य सरकार को दोबारा एक परिपत्र जारी करके यह कहना पड़ा कि बराक घाटी की आधिकारिक भाषा (बांग्ला) सभी आधिकारिक कार्यों के लिए उपयोग की जाएगी। लेकिन असमीया और बांग्ला का संघर्ष यहीं समाप्त नहीं हो जाता।

असम में बांग्ला भाषा बोलने वाले एक समुदाय है- मियां। मियां समुदाय की भाषा शुद्ध बांग्ला न होकर बांग्ला की एक बोली है, जिसको सिलेटी एवं बांग्लादेशी भाषा भी कहा जाता है। असम की कुल जनसंख्या के 21 प्रतिशत मियां लोग हैं। इस समुदाय के 90 प्रतिशत लोग कृषि व्यवसाय से जुड़े हुये हैं। धर्म के आधार पर जब भारत का विभाजन किया जा रहा था, तब इस मुद्दे को भी उठाया गया था कि मियां मुसलमान, जो संख्या में असम की दूसरा बड़ा समुदाय है, भारत में रहेंगे या पूर्व पाकिस्तान जाएंगे? जब मियांओं से उनकी मर्जी पूछी गयी, तो उनमें से अधिकांश ने असम में ही रहने का फैसला किया था। तब उनके फैसले को स्थानीय असमीया लोगों ने भी आदर पूर्वक स्वीकार कर लिया था। लेकिन आजादी के बाद जब परिस्थिति बदल जाती है, मियांओं के विरुद्ध ‘असम आंदोलन’ (1985) रचा जाता है, असंख्य लोगों को फिर अपनी जान की  कुर्बानी देनी पड़ती हैं। आंदोलन की अगुवाई करने वाले छात्र नेता अमस में अपनी पार्टी की सरकार बनाते हैं, उनमें से एक सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड भी बनाते हैं। इस प्रकार असम भाषा-संस्कृति के नाम पर मियां समुदाय को प्रताड़ित करने की एक स्थायी मशीनरी कायम होती है।

विभिन्न समय पर, खास करके ‘बांग्लादेश मुक्ति युद्ध’ के दौरान हजारों लोगों ने बांग्लादेश से असम में आकर शरण ली थी। उन शरणार्थियों में हिंदू-मुसलमान दोनों समुदाय के लोग थे। नियम के मुताबिक युद्ध समाप्त होने के बाद शरणार्थियों को वापस अपने देश लौट जाना चाहिए था। लेकिन अवैध रूप से असम (भारत) आकर बसने वाले उन शरणार्थियों में से शायद कोई भी वापस बांग्लादेश नहीं लौटें। इसके चलते असम, जो कि पूर्वोत्तर भारत का एक छोटा सा राज्य है, की जनसंख्या में भारी वृद्धि दर्ज की गयी। लेकिन दुर्भाग्यवश, उस जनसंख्या वृद्धि का एकमात्र कसुरवार बांग्लाभाषी मुसलमानों को ठहराया गया। जब असम के संपूर्ण मियां-भाषी मुसलमानों को अवैध घुसपैठिये की आख्या दी गयी, तो उसकी चपेट में वे लोग भी आ गए जो वर्षों से असम में रह रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने उस मौके का फाएदा उठाया और वह मियां समुदाय के लिए रक्षा कवच बन कर सामने आयी। ‘इल्लीगल इमीग्रेंट डिटरमिनेशन बाई ट्रिब्यूनल एक्ट’ (आईएमडीटी, 1985) उसी कवच के कानूनी अमली जामा का नाम था। हालांकि अब भारत के माननीय उच्चतम न्यायालय ने उस कानून को खारिज कर दिया है। असम में एनआरसी लागू करने का मकसद भी घुसपैठियों की पहचान करना था। उसके लिए व्यक्ति को, खुद को असम का नागरिक साबित करने के लिए 24 मार्च, 1971 से पहले जारी किया दस्तावेज बतौर सबूत पेश करना था। इसके लिए 1951 के एनआरसी या 24 मार्च,1971 तक जारी किया गया इलेक्ट्रोल रोल मान्य था। एनआरसी के लिए असम सरकार ने राजकोष के 1288 करोड़ रुपया खर्च किया। हजारों कर्मचारियों एवं लाखों जनता ने 2 वर्षों तक बद से बदतर हालत का सामना किया। लेकिन जो नतीजा सामने आया, उससे भी लोग असंतुष्ट ही दिखें। पहले यह मुद्दा केवल भाषा-संस्कृति तक ही सीमित था। लेकिन अब इसका साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हो गया है। इसीलिए कोई कहते हैं- हमें वोट दो, नहीं तो मियां सत्ता में आ जाएगा। दूसरी ओर से कोई आवाज देते हैं- हमें वोट दो, हम पहले की तरह ही आपको सुरक्षा प्रदान करते रहेंगे। वर्तमान समय में ऐसा भी देखा जा रहा है कि मियां समुदाय के कुछ लोगों ने अपनी भाषा-संस्कृति को समृद्ध बनाने के लिए, मियां भाषा में साहित्य सर्जन का काम शुरू कर दिया है। औपचारिक बोलचाल में, सोशल मीडिया में, यहां तक कि न्यूज चैनलों में मियां भाषा का खुल कर प्रयोग करना, इस समुदाय की आत्मबल में वृद्धि का संकेत देता है।

आगे हम बात करेंगे असम के दूसरे सबसे  शोषित, पीड़ित, दलित वर्ग की भाषा-संस्कृति के बारे में। असम में जनसंख्या की दृष्टि से वे तीसरे स्थान पर आते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं- असम की चाय जनजाति के बारे में। असम में चाय जनजाति के लोगों का इतिहास 150 साल पुराना है, लेकिन आज भी यह समुदाय राज्य के सबसे पिछड़े समुदायों में से एक माना जाता है। असम के चाय बागानों में काम करने वाले लोगों की संख्या, असम की कुल जनसंख्या के लगभग 17 प्रतिशत हैं। चाय बागानों में काम करने वाले मजदूर मूल रूप से आदिवासी और पिछड़े वर्ग के हिंदू हैं, जो उन्नीसवीं सदी के मध्य से बीसवीं सदी के मध्य तक, मध्य-पूर्वी भारत से यहां लाकर बसाए गए थे। सन् 1840 के दौरान छोटा नागपुर (झारखंड) में आदिवासी लोगों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। उस पर नियंत्रण पाने के लिए तथा सस्ते  श्रमिकों की कमी को दूर करने के लिए, ब्रिटिश अधिकारियों ने आदिवासियों एवं कुछ पिछड़े वर्ग के हिंदुओं को गिरमिटिया मजदूर बनाकर,  जबरन असम के चाय बागानों में लाकर डाल दिया था। तब से वे लोग पीढ़ी दर पीढ़ी बागान में ही रह रहे हैं। आज भी कम से कम वेतन पर मजदूरी करने के लिए वे मजबूर हैं। उनकी दूसरी समस्याओं को छोड़कर केवल भाषा-संस्कृति पर बात करें, तब भी बदहाली ही देखने को मिलती है। चाय बागान के मजदूर लंबे समय से आदिवासी समुदाय के रूप में संवैधानिक दर्जा मांग रहे हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियां उनको अधिकार दिलाने के नाम पर, वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। आदिवासी समुदाय के रूप में संवैधानिक दर्जा मिलने पर उनकी बहुत सारी समस्याएं दूर हो सकती थीं। आज उनकी भाषा की कोई पहचान नहीं है, साहित्य में उनके लिए कोई जगह नहीं है। उनकी कला-संस्कृति असमीया मनोरंजन जगत में केवल आइटेम नंबर बनकर रह गयी हैं। सदरी, ओडिया, सौरा, कुरमाली, कुरुख, गोंडी, कुई, खारिया, संथाली, मुंडारी आदि बागान की प्रमुख भाषाएं हैं। लेकिन इनकी कोई औपचारिक पहचान नहीं है। असम के चाय बागान के मजदूरों की भाषाओं ने अब अपना स्वरूप भी बदल लिया है। उनके जीवन की तरह उनकी भाषाएं भी असमीया प्रभुत्व के अधीन हो गयी हैं। जैसे – जैसे उनकी साक्षरता दर में वृद्धि हो रही है, नई पीढ़ी के लोग अपनी मातृभाषा छोड़कर मानक हिंदी, असमिया और अंग्रेजी भाषा को अपनाने लगी है। शायद अपनी मातृभाषा को पीछे छोड़कर वे उस अंधकार से बाहर निकलना चाहते हैं, जिसमें कि उनके पूर्वज तड़प-तड़प कर अपना जीवन बिताया करते थे।

असम में असंख्य आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं, जिसकी थोड़ी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। सभी आदिवासियों की अपनी नीजी भाषा-संस्कृति है। लेकिन असम के स्थानीय आदिवासियों  (सिवाय बोडोओं के) ने कभी अपनी भाषा-संस्कृति के लिए पृथक मांग नहीं की। इसका मूल कारण यह है कि उन्होंने अपनी पहचान को ‘एक असमीया पहचान’ में विलय कर लिया है। एक समय में ऐसा मियां समुदाय ने भी किया था, लेकिन अब उनकी मनोवृत्ति में बदलाव परिलक्षित हो रहा है। इसके अलावा असम में पंजाबी, मारवाड़ी, नेपाली, भोजपुरी जैसे कई बड़े भाषिक समुदाय हैं, लेकिन उन्होंने भी कभी अपनी भाषा की आधिकारिक पहचान के लिए मांग नहीं उठायी। उल्लिखित भाषिक समुदायों की जनसंख्या- सब मिलाकर असम की कुल जनसंख्या के 7-8 प्रतिशत से कम नहीं होगी, लेकिन भाषिक प्रयोग की दृष्टि से देखा जाए तो इनकी मातृभाषाएं दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही हैं। ये लोग अपनी मातृभाषा की जगह या तो अमसीया का इस्तेमाल करते हैं या फिर हिंदी। अंग्रेजी का इस्तेमाल मध्य वर्ग या कुछ उच्च वर्ग के लोग करते होंगे। हालांकि उल्लिखित भाषिक समुदायों ने अपनी संस्कृति को जरूर बचाकर रखा है। रस्म-रिवाज, पर्व-त्यौहारों का पालन ये लोग धूमधाम से करते हैं। असमीया भाषी समुदाय में भी एक उदारता बढ़-चढ़ देखने को मिलती है, वे कभी किसी भाषाई अल्पसंख्यक को उनके पर्व-त्यौहार मनाने पर रुकावट नहीं डालते। उनको दिक्कत केवल दूसरों की आधिकारिक भाषिक पहचान से है। (अध्ययन जारी है…)

लेखक का पताः

बुद्ध विहार, नई दिल्ली

1 Comment

  • Priyanka Kumari Posted May 16, 2021 9:54 pm

    Bahut achcha likha hai

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