बाबा हमारे दिल में हैं

आत्मा के अस्तित्व पर मेरा पहले कोई विश्वास नहीं था। लेकिन इस पुस्तक की भूमिका लिखने से पहले जब मैं सोच रहा था कि भूमिका में मैं क्या लिखूँगा? तो मुझे ऐसा लगा, बाबा मेरे पास बैठे हैं और अपनी जिज्ञासा भरी आँखों से मेरी ओर देख रहे हैं। उनका निर्वाक् चेहरा मानो यह कह रहा था कि “मैंने जीवन भर लोगों के हित में काम किया है। लेकिन आज लोग मुझसे ज्यादा मेरे विरोधियों को याद करते हैं। इसलिए कोई मेरा मज़ाक उड़ाता है, तो मुझे नयी बात नहीं लगती है।” बाबा के प्रति लोगों की इस उदासिनता को देखकर मेरे मन में एक सवाल पैदा हुआ था, जो मेरे मन को कुरेद रहा था। इसलिए बाबा नागार्जुन के जीवन दर्शन को भली-भाँति समझना मेरे लिए एक प्रकार से अनिवार्य ही हो गया था।

बाबा नागार्जुन से मेरी कभी कोई व्यक्तिगत भेंट नहीं हो पायी। क्योंकि बाबा ने जब दुनिया को अलविदा कहा तब मैं महज़ दस ग्यारह साल का रहा हूँगा। उन दिनों असम के एक छोटे से गांव में मेरा जीवन बीत रहा था। बाबा से मेरा पहला परिचय उनकी कविता के माध्यम से ही हुआ। पहली बार जब मैंने बाबा की कविता पढ़ी थी, तो मैं स्नातक प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। उनकी कविता ‘बादल को घिरते देखा है’  गुवाहाटी विश्वविद्यालय के स्नातक के कोर्स में आजतक चल रही है। मैं आभारी हूँ मेरे कॉलेज के अध्यापक अनिरुद्ध बायन सर का जिन्होंने हमें कविता के मर्म से परिचित कराया। नागार्जुन के प्रति मेरे मन में आकर्षण बढ़ने का एक कारण यह भी था कि कॉलेज की कक्षा में बाबा की कविता हमें बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया गया था। पूर्वोत्तर भारत का आकाश इस बात का गवाह रहा होगा कि मेरा कल्पनाशील मन उन दिनों बादल को देखकर कितना खुश हो जाया करता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे मैं भी कवि बन रहा हूँ। कुछ पंक्तियां हमेशा मेरे मन में लहरों की तरह नाचती रहती थीं।

एम.ए. में आकर नागार्जुन की दूसरी प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ पढ़ी थी। विश्वविद्यालयी जीवन के जिस तनाव से  सब गुजरते हैं, मेरे लिए भी सबकुछ वैसा ही था। यह जीवन का एक ऐसा दौर होता है, जब किसी चीज की कोई कमी न होते हुए भी, मन में हमेशा अकाल पड़ा रहता है। कैरियर के स्थायित्व को लेकर जीवन में बेहद भाग-दौड़ मच जाती है। ऐसे समय में नागार्जुन की कविता पढ़कर मुझे बहुत अच्छी सीख मिली थी। तब से मां-बाप के सामने पैसा के लिए बेवजह मगरमच्छ की आँसू बहाना मैंने बंद कर दिया है। अभाव क्या होता है, आर्थिक संकट के कारण जीवन में कैसी परिस्थिति उत्पन्न हो सकती है, यह सब बातें नागार्जुन की कविता पढ़कर मैंने पहली बार महसूस किया था। एक छोटे से घर का सबसे बड़ा लड़का होने के नाते, यह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि की बात थी कि मैं यथासमय अपने मां-बाप के दुःख दर्द को समझने का लायक बन गया था। तब से लेकर आजतक बाबा नागार्जुन मेरे विवेक का अंग बने हुए हैं।

सन् 2011 की एक शाम की बात है। तब मैं असम से दिल्ली आ चुका था और सौभाग्यवश मुझे जे.एन.यू. के शोधार्थी बनने का मौका भी मिल चुका था। खैर, मैं उस दिन अपने कुछ साथियों के साथ बातचीत कर रहा था। अक्सर जे.एन.यू. की शाम ऐसी ही बीत जाती है। संयोगवश उस दिन बातचीत के दौरान, एक साथी ने मेरे प्रिय कवि बाबा नागार्जुन के खान-पान के बारे में एक विशेष टिप्पणी की थी। टिप्पणी बाबा के शान के खिलाफ़ थी। अपने प्रिय कवि के बारे में इस तरह की बात सुनने का मैं अभ्यस्थ नहीं था। हांलाकि तबतक बाबा नागार्जुन के बारे में मैं भी बहुत कुछ नहीं जानता था। सच कहा जाए तो केवल उनकी दो ही कविता मुझे पढ़ने का मौका मिला था। लेकिन उस शाम की बातचीत के बाद मेरे मन में बाबा को लेकर कई  प्रश्न उठने लगे थें। उन्हीं सवालों का जवाब खोजते-खोजते आख़िर एक दिन इस पुस्तक की योजना बन गयी। ठीक-ठीक शब्दों में कहा जाए तो बाबा को लेकर मेरे मन में जो प्रश्न उठते थें, उन्हीं प्रश्नों का जवाब ही है यह पुस्तक।

जे.एन.यू. के दूसरे विद्यार्थियों की तरह मेरे लिए भी यह सौभाग्य की बात है कि मैंने प्रो. मैनेजर पाण्डेय जैसे अध्यापक-आलोचक को गुरु के रूप में पाया हैं। मेरे लिए यह भी गर्व की बात है कि वे मेरे सह-शोध निर्देशक भी रह चुके हैं। एक दिन बातचीत के दौरान पाण्डेय जी से मैंने नागार्जुन को लेकर एक पुस्तक की योजना के बारे में चर्चा की थी। पहले तो उन्होंने मेरी बातों को ध्यान से सुना, ऐसा करना उनकी चिरपरिचित आदत है। उसके बाद मेरी योजना की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि “यह तुमने अच्छा सोचा है। अगर सही तरीके से काम किया जाए तो यह बड़ा महत्वपूर्ण काम होगा।” उनकी राय सुनकर मेरा इरादा और पक्का हो गया था। उसके बाद, इस योजना को कैसे सफल बनाया जाए, इस संदर्भ में सोच-विचार करना जरूरी था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पाण्डेय जी से बाबा नागार्जुन के बहुत ही घनिष्ठ संबंध रहा है। लेकिन मुझे उन लोगों की आपसी घनिष्ठता के बारे में तब तक कुछ भी मालूम नहीं था। यह मेरे लिए  किस्मत की बात थी कि उन दिनों प्रो. देवशंकर नवीन अध्यापक बनकर जे.एन.यू. आए थें। नवीन जी इग्नू में भी मेरे अध्यापक रह चुके हैं। उनसे जब मैंने इस पुस्तक के बारे में चर्चा की और कहा कि इसे पूरी करने में मुझे आपकी मदद की जरूरत पड़ेगी, तो उन्होंने कहा कि “इस मामले में तुम्हें अगर सबसे ज्यादा मदद कोई कर सकते हैं, तो वे हैं प्रो. मैनेजर पाण्डेय जी।” उन्होंने उसी समय यह भी बता दिया था कि बाबा नागर्जुन से पाण्डेय जी के बहुत निकट संबंध रहा हैं।

‘नागार्जुन दिल्ली में’ पुस्तक के अध्ययन का दायरा केवल दिल्ली तक ही सीमित है। इस दायरे के अन्तर्गत बाबा नागार्जुन के जीवन से जुड़ी हुई अनेक अप्रकाशित बातों को प्रकाश में लाने का प्रयास किया गया है। इसमें मेरे उन सवालों के जवाब भी हैं जिनको लेकर बाबा के प्रति मेरे मन में शंकाएँ थीं। इस पुस्तक में दिल्ली में रहने वाले कुछ वरिष्ट लेखकों के संस्मराणात्मक लेख शामिल हैं। इन लेखकों से बाबा के अति निकट संबंध रहे हैं। इसमें केवल साहित्यकार ही नहीं हैं, दूसरे क्षेत्रों के लोगों ने भी अनेक महत्वपूर्ण बातें कही हैं जो अबतक बाबा नागार्जुन के बारे में बहुत कम लोग जानते थें। मेरी कोशिश यह थी कि बाबा के साहित्य, उनकी आदतें, उनके व्यवहार, उनके जीवन संघर्ष, उनकी सामाजिक चिंताएं जैसे विषयों पर खुलकर बातें की जाएँ, ताकि इस पुस्तक को पढ़कर उनके बारे में एक स्पष्ट राय बनायी जा सके। इस प्रयास में मैं कितना सफल रहा हुआ हूँ, यह तो आने वाले दिनों में पाठक ही तय करेंगे।

व्यक्तिगत कारणों से इस पुस्तक का काम समय पर पूरा नहीं कर पाया, जिसका मुझे खेद है। जे.एन.यू. आने के बाद मुझे जिन चार लेखकों पर विशेषाध्यन करने का अवसर मुझे मिला है, वे चार लेखक हैं; कबीरदास, बाबा नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु और बीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य। संयोगवश ये चारों लेखक एक ही विचारधारा की उपज हैं। जब मुझे समझ आया कि इन चारों की विचारधारा को एकत्र करके ज्ञान का एक संगम बनया जा सकता है, तब इस पुस्तक को पूरी करने की होड़ सी मची थी। लेकिन मुझमें भटकने की भी एक पुरानी आदत रही है। इसलिए मैं स्थिर मन से कोई एक काम कभी नहीं कर पाता। वर्तमान में जो काम मैं कर रहा होता हूँ, उसकी तुलना में कोई दूसरा बेहतर काम हमेशा मेरा इन्तजार कर रहा होता है। इसलिए मैं वर्तमान को छोड़कर भविष्य के पीछे भागने लगता हूँ। हांलाकि ऐसा समझने और करने को भ्रम के अलावा और कुछ नहीं कहेंगे। लेकिन इसबार थोड़ा कम भटकना पड़ा। क्योंकि इसी काम के सिलसिले में मेरा परिचय रेशमा (पुतू) से हुआ था। इस बात के लिए मैं ख़ुद को रेशमा का चिर ऋणी मानता हूँ कि उसने मेरी अन्तरात्मा की लगभग बुझी हुई रोशनी को फिर से उजागर करने में मदद की। ‘नागार्जुन दिल्ली में’ शीर्षक पुस्तक 2015 में ही प्रकाशित हो चुकी होती। लेकिन बीच में मैंने साहित्य की पढ़ाई छोड़ने का निश्चय कर लिया था। लेकिन रेशमा के स्नेह और आदर ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया। मेरे लिए उन्होंने एक सच्चे दोस्त की भूमिका बख़ूबी निभाई हैं।

बाबा नागार्जुन दिल्ली में आपातकाल (इमरजेन्सी) के बाद से रहने लगे थे। उस समय दिल्ली का वातावरण नागार्जुन जैसे जनकवि के लिए अनुकूल भी था। बाबा नागार्जुन ने सत्ता को चुनौती देने वाली कविताएं लिखी हैं, ऐसा उनके संपर्क में रहने वाले हर कवि-साहित्यकार, पत्रकार,  आलोचक, अध्यापक  मानते हैं। इस पुस्तक के सभी लेखक ख़ुद आपातकाल के दौर से गुजर चुके हैं। उन्होंने उस समय की परिस्थिति को अपनी आँखों से देखी हैं। पाण्डेय जी और नवीन जी की मदद से मैं उन सब तक पहुँच पाया जिनके साथ बाबा की निकट आत्मियता रही हैं। हालांकि बाद में हर कोई एक-दूसरे के बारे में यह भी बताते रहें कि किसके साथ बाबा का कैसा वर्ताव था। मैं इसलिए आप सभी लेखकों के आभारी हूँ। ‘अलाव’ पत्रिका के संपादक रामकुमार कृषक जी को उनके विशेष योगदान के लिए अशेष धन्यवाद देता हूँ।

बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए लेखकों के घर जाना, उनके साथ उठना-बैठना, उनके परिवार के साथ मिलना-जुलना, मेरे जीवन की अविस्मरणीय याद बनकर रह गयी। इस सिलसिले में कई बार रेशमा भी मेरे साथ होती थी। पंकज सिंह जी को याद करता हूँ तो आज भी मन भावुक हो जाता है। बाबा के बारे में इतना दिल खोलकर बात करने वाले दोबारा शायद ही कोई मिलेंगे। मुझे तो ऐसा भी लगता है कि बाबा के बारे में विस्तार से बताने के लिए ही वे रुके हुए थें। मुझसे बातचीत करने के महज़ कुछ ही दिन बाद उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। शायद यही उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार है। पंकज सिंह, उनकी पत्नी सविता सिंह (कवियत्री), असगर वजाहत, रेशमा और मैं इसी काम के सिलसिले में एक शाम को इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर (दिल्ली) में मिले थें। भावुकता और बौद्धिकता से भरी वह शाम इतनी प्रेरणादायक थी कि वहां से लौटते वक्त मैं रेशमा से कह रहा था- “रेशमा, सचमुच, आज पहली बार मुझे यह महसूस हुआ कि मैं भी जीवन में कुछ बन सकता हूँ।” बहुत देर तक उसने कोई जबाव नहीं दिया था। फिर धीरे से केवल इतना ही कहा- “बिल्कुल…।” उस दिन रेशमा मुझसे भी ज्यादा भावुक लग रही थी। और मैंने भी उसी दिन, उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में, दूर तक साथ चलने का सपना देखा था।  वह मेरी कल्पना थी। हालांकि बाद में मुझे यह भी समझ आया कि साहित्यकारों के सपनें अधूरा क्यों रह जाते हैं? एक और घटना बार-बार याद आती है। हम लोग विश्वनाथ त्रिपाठी जी के घर आये हुए थें। त्रिपाठी जी बता रहे थें कि बाबा को मछली बहुत पसंद थी। यह बात उनके बारे में लगभग सभी लेखकों ने कही हैं। त्रिपाठी जी को यह पहले से ही पता था कि मैं असम से हूँ। भारत के असम प्रदेश अनेक प्रकार की स्वादिष्ट मछलियों के लिए जाना जाता है। जब उन्होंने मछलियों के बारे में मुझसे पूछताछ शुरू किया, तो रेशमा भी पास ही बैठी थी। वह त्रिपाठी जी से पूछने लगी- “सर, आपको भी मछली खाना पसंद करते हैं?” उन्होंने कहा- “हां, मुझे मछली बहुत पसंद है। हम लोग अपने घर में मांसाहार भी करते हैं। क्या तुम भी मछली बनना जानती हो?” रेशमा ने कहा- “हां, मैं बहुत अच्छी मछली पकाती हूँ। आप इज़ाजत देंगे तो आपको भी एक दिन बनाकर खिलाऊँगी।” उसकी बातें सुनकर त्रिपाठी जी को बड़ी खुशी हुई और उन्होंने हमें दोबारा घर आने का दावत भी दिया। लेकिन हम दोबारा नहीं जा पायें। क्योंकि इस बीच रेशमा की शादी तय हो गयी और वह अपनी दुनिया में रहने लगी। इस तरह की और भी बहुत सी घटनाएं हैं, जिनको याद करके हँसी भी आती है,  दुःख भी होता है, प्रेरणा भी मिलती है। दरअसल तमाम खट्ठी-मिठी यादों से भरी रही बाबा नागार्जुन के साथ हमारी यह छोटी सी यात्रा। इस पुस्तक को प्रकाशक के हाथ में सौपने से पहले मुझे एक बात की कमी खल रही थी कि बाबा नागार्जुन जैसे विशाल ह्रदय के व्यक्तित्व को समझने के लिए मुझे भी उनके जैसा ही (यात्री) बनना चाहिए था। लेकिन मेरे जैसा सामान्य इंसान के लिए यह कैसे संभव हो पाता…

बाबा नागार्जुन एक सहज-सरल और स्पष्टवादी व्यक्ति थे। उनके व्यक्तित्व में किसी भी तरह की कोई चतुराई नहीं थी। वे जो पसंद करते थें, उसके बारे में हमेशा साफ़ बात करते थें। बाबा सत्ता से कभी नहीं डरते थें। हालांकि वे सबका आदर करना भी जानते थें। बच्चों से उन्हें बहुत लगाव था। उन्होंने कभी किसी के यहां नौकरी नहीं की। इसीलिए आर्थिक परेशानियां हमेशा उनके साथ जुड़ी रहीं।  बचपन से लेकर जीवन के अंतिम दिनों तक उन्होंने एक ही जैसा संघर्षमय जीवन जीया। लेकिन संघर्षों से हार कर वे कभी किसी चीज़ से समझौता नहीं करते थें। जरूरत पड़ने पर वे किसी से कुछ मदद तो मांग लेते थें, लेकिन कोई अपनी ओर से कुछ दे देते थें, तो वे आसानी से स्वीकार नहीं करते थें। बाबा को किसी का एहसानमंद होना पसंद नहीं था। मैंने दिल्ली के कोने-कोने में बाबा को ढूँढा और यही पाया कि बाबा जहाँ भी जाते थें, आज भी उनके एहसास वहां पहले जैसा ही मौजूद हैं। सादतपुर की वे गलियाँ, जहाँ से बाबा गुजरते थें, जैसे आज भी उनके चरणस्पर्श के लिए तड़प रही हैं। जे.एन.यू. की सड़कें उनकी क्रांति की कविता सुनने के लिए जैसे आज भी इंतजार कर रही हैं, दरियागंज के प्रकाशन गृहों में जैसे उनकी नयी पुस्तकों की चर्चा हो रही हैं। लेखकों के घरों में जाकर ऐसा लगता था, जैसे वहां आज भी बाबा की  पसंदिदा खाना पकायी जाती है। आज भी जब जे.एन.यू. (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) के परिसर में काव्यपाठ होता है या किसी राजनीतिक आंदोलन की बात की जाती है या किसी सामाजिक हित की लड़ाई लड़ी जाती है, तो वहाँ के लिए बाबा नागार्जुन की कविताएँ पढ़ने की परंपरा बनी हुई है। ऐसा लगता है कबीर के बाद एक बाबा नागार्जुन ही हैं जिन्होंने सर्वत्र सबके दिलों में जगह बनायी है। दरअसल, बाबा ने कबीरदास  की काव्य परंपरा को ही आगे बढ़ाया है। देश भर में नागार्जुन के असंख्य जानने वाले थे। पूरे देश को उन्होंने अपना घर मान लिया था और देशवासियों को अपना परिवार। इसीलिए वह कहीं भी जा सकते थें, किसी भी घर में रुक सकते थें। बाबा के जानने वाले भी हमेशा उनसे मिलने के लिए बेचैन रहते थें। हर कोई चाहता था कि बाबा आज उनके घर ही रुकें। इस तना-तनी में उनके प्रशंसकों में कभी मिठी बहस भी हो जाती थी। इस पुस्तक में ऐसे अनगिनत प्रसंगों के उल्लेख हैं। जब कोई बाबा के बारे में कुछ कहते हैं, तो हर एक शब्द बोलने वाले के दिल से निकलते हैं। हर कोई अपने शब्दों में यह जाहिर करना चाहा कि बाबा उनके दिल में हैं…

इस पुस्तक को पूरा करने में किसी प्रकार की पूर्व प्रकाशित सामाग्री का उपयोग नहीं किया गया है। केवल ‘यह जे.एन.यू.’ शीर्षक कविता नागार्जुन रचनावली से ली गयी है। इस पुस्तक में शामिल सभी लेख पहले साक्षात्कार के रूप में रिकॉर्ड किए गए थें। बाद में उन्हें लिप्यांतरण के ज़रिये वर्तमान रूप में दिये गए हैं। लेखों के साथ बिना कोई छेड़-छाड़ किए ही उन्हें पुस्तक में शामिल किए जा रहे हैं। इस पुस्तक की सारी यादें दिल्ली से जुड़ी हुई हैं। इसमें बाबा नागार्जुन से जुड़ा हुआ हर एक छोटा-बड़ा प्रसंग पर चर्चा की गयी है। इसलिए यह पुस्तक बाबा नागार्जुन के व्यक्तिगत और साहित्यिक जीवन का प्रत्येक रहस्य को उजागर करती है। तो यह पुस्तक भविष्य में बाबा पर होने वाले शोध कार्यों के लिए प्राथमिक स्रोत की भूमिका निभा सकती है। प्रोफेसर मैनजर पाण्डेय जी का मार्गदर्शन मेरे जैसे अल्पज्ञानी विद्यार्थी के लिए पत्थर की लकीर जैसा है। प्रकाशन कार्य और पुस्तकीय बारीकियों के बारे में मैंने जो कुछ सीखा है, सब उनकी ही देन है। प्रो. देवेन्द्र कुमार चौबे और प्रो. देवशंकर नवीन जी का मार्ग दर्शन मेरे जीवन की बहुमूल्य संपत्ति है।  इस पुस्तक को अंतिम रूप देने में नवीन जी ने जो सहयोग दिया है, उसके लिए मैं ह्रदय से उनका आभारी हूँ। इस पुस्तक के सभी लेखकों को भी मैं धन्यवाद देता हूँ। आप लोगों के सहयोग के बिना मेरा सपना कभी साकार नहीं हो पाता। मेरे पिता अब्दुर रहमान और माँ जहाँआरा दीवान को धन्यवाद देकर उनकी ममता को कमज़ोर साबित नहीं करना चाहता। इस पुस्तक के प्रकाशक को भी मैं धन्यवाद देता हूँ। रेशमा (पुतू) को धन्यवाद देना मुझे गवारा नहीं है। क्योंकि यह पुस्तक जिनती मेरी है उतनी ही उनकी भी है। उनकी प्रेरणा न होती तो यह काम शायद ही कभी पूरा हो पाता। अतं में प्रिय पाठकों से यही निवेदन करना चाहूँगा कि प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से बाबा नागार्जुन को जानने, उनके साहित्य को समझने और बाबा के बारे प्रचलित किंवदन्तियों एवं गलतफहमियों को दूर करने में अगर आपको मदद मिलती है, तो मैं अपनी मेहनत को सार्थक समझूँगा।

जाहिदुल दीवान

1 Comment

  • जाहिदुल दीवान Posted March 24, 2020 5:27 am

    बहुत अच्छा

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